युवाओं के लिए किताबें कहाँ हैं ?

आप शहरों के जाने माने किताबघरों में जाइए और बड़े बच्चों और युवाओं के कोने में किताबों को देखिए | आपको नीचे फोटो में दिखाई किताबें दिखेंगी | हैरी पॉटर, ट्वाईलाईट (twilight), पर्सी जैक्सन, हंगर गेम्स जैसी जानी मानी किताबें तो ज़रूर ही मिल जायेंगी | इन किताबों में कहानियां युवाओं से सीधा बात करती हैं – चाहे वो मृत्यु हो या सेक्स – इसलिए वह युवाओं को पसंद भी आती हैं| पर ये सारी अंग्रेजी में हैं | उतना ही नहीं, इनमे से कोई भी भारतीय सन्दर्भ में नहीं हैं | हमारे देश के बाकी भाषाओँ का क्या?

Young Adult Books

तो अगर आपकी उम्र 10-18 वर्ष के बीच में है और आप अपनी पाठ्यपुस्तकों के अलावा कुछ रोमांचक, दिलचस्प और मज़ेदार हिंदी में पढ़ना चाहते हैं तो आपके पास क्या विकल्प हैं ? या तो सदियों पुरानी पंचतंत्र, रामायण, महाभारत, अमर चित्र कथाएं, अकबर-बीरबल, तेनाली राम, विक्रम बेताल जैसी किताबें हैं |

अकबर बीरबल की किताबेंरामायण पुस्तक

या फिर महान व्यक्तियों की जीवनी |

या फिर प्रेमचंद की पुरानी, गंभीर संक्षिप्त कहानियां | थोड़ा और खोजें तो रस्किन बौंड की हिंदी में अनुवादित किताबें काफी मनोरंजक हैं |

प्रेमचंदरस्किन बांड हिंदी में

राज कॉमिक्स – नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव, दोगा इत्यादि – अभी भी उपलब्ध हैं और आशा करता हूँ की जितने चाव से मैंने पढ़ी हैं, उतने ही चाव से पढ़ी जाती हैं |

पर क्या ये किताबें आज कल के युवाओं और किशोरों लिए काफी हैं ? हैरी पॉटर ज़रूर हिंदी में उपलब्ध है लेकिन उसके जैसी कोई और किताबें नहीं हैं | भारतीय सन्दर्भ में, भारतीय भाषाओँ में आधुनिक समय की पुस्तकों की बहुत कमी है | लेकिन किशोरों के लिए तो लगता है कि किताबें लिखी ही नहीं जा रही हैं |

अंग्रेजी में तुलिका, डकबिल, रेड टर्टल, पेंगुइन (पफ्फिन) जैसे कई प्रकाशक अच्छी पुस्तकें ला रहें हैं | तुलिका की ‘माईल’ के बारे में तो पहले भी बात करी है | डकबिल की ‘टॉकिंग ऑफ़ मुस्कान‘ बहुत संवेदनशील है | इसके अलावा इन्होने और भी कई अच्छी किताबें प्रकाशित करी हैं |

असल में हमारा ध्यान हमारे छोटे बच्चों पर इतना है की हमारा ध्यान किशोरों के पूर्ण विकास की तरफ कम जाता है | हम उनको बोर्ड और कॉलेज की परीक्षाओं को देने वाली मशीन समझने लगते हैं | उनके लिए किताबें सिर्फ शिक्षाप्रद और देश भक्ति से पूर्ण होती हैं | उनकी उम्र के अनुसार उनकी इच्छाओं और बदलावों को समझ नहीं पाते हैं | इसलिए ही वे फेसबुक, इन्टरनेट और दोस्तों के साथ ही अपना समय बिताना पसंद करते हैं | इस उम्र में उनके लिए उचित, मनोरंजक, संवेदनशील किताबें लिखना बहुत आवश्यक है | अनुवाद ही सही, पर एकलव्य प्रकाशन ने तुलिका की कुछ अच्छी पुस्तकों को हिंदी में प्रकाशित किया है | उनकी किताबों में अंडमान का लड़का, अदिति की साहस कथाओं , पिप्पी लम्बेमोज़े जैसी अच्छी किताबें शामिल हैं | पर देश के कड़ोड़ों किशोरों के लिए सिर्फ ये 8-10 पुस्तकें ही काफी हैं क्या?

मुझसे ज़रूर कई किताबें छूट गयी होंगी | अगर आप किसी अच्छी हिंदी किशोरों की किताबों को जानते हैं तो कृपया बताएं |

Indian Languages marginalized

English is overwhelmingly the dominant language on the web. However, Indian languages are one of the most marginalized languages on the internet if we take into account the vast number of people that speak them.

If you look at this popular infographic, Hindi has the 4th highest number of speakers after Chinese, English and Spanish. Bengali comes at 6th. Linguistic Distribution of the World Linguistic Distribution of the World

However, if you look at distribution of online content by language, one finds that Hindi has a minuscule share of 0.02%. The other Indian languages are even lesser.

Internet Share

The educated, urbanized India is rapidly letting go of the Indian languages. If one looks at Amazon India website and looks at their selection of books by language.

Language # Books
English 14333137
Hindi 38035
Kannada 11083
Tamil 9839
Malayalam 9743
Telugu 7102
Bengali 4499
Marathi 4196

If we make a pie-chart of the same, we get

This graph shows an overwhelming domination by English language books. Amazon obviously has most of its books from its already humongous database compiled internationally. However, the picture of just Indian writing on amazon is only slightly better.

Indian Fiction Amazon

Even in Indian writing, books written in English are in overwhelming majority. Since amazon mostly caters to more urbanized, richer, more educated people we need to see why Indian languages hold such a small share in their reading.

Is it lack of good content in Indian languages? Are they not able to meet the urban tastes? Is our education system creating citizens who don’t like to read in their mother tongue but prefer reading in English?

वाणी प्रकाशन : एक नई हिंदी किताब रोज़

वाणी प्रकाशन 50 साल से हिंदी पुस्तकों का प्रकाशन कर रहीं है और 4500 से ज्यादा किताबें आज तक प्रकाशित कर चुकी हैं | वाणी प्रकाशन की अदिति महेश्वरी ने प्रिंटवीक को भारत में हिंदी किताबों की महत्ता के बारे में बताया | इस अंग्रेजी आर्टिकल की कुछ हिंदी में झलकियाँ प्रस्तुत हैं |

किताबों का मातम मनाने वालों की ज्यादा मत सुनिए | किताबें भारत में अच्छी चल रही हैं, खासकर की भारतीय भाषाओँ वाली |

वाणी प्रकाशन एक आम प्रकाशक नहीं है | वह लोकप्रिय (पोपुलर) किताबें सस्ते में नहीं निकालते | उनकी दृष्टि हिंदी के प्रसंग में विश्वीय है | वहां जापानी माँगा कॉमिक्स का भी हिंदी में अनुवाद चल रहा है |  यह दर्शाता है की वाणी दुनिया भर का साहित्य हिंदी के दायरे में प्रस्तुत करना चाहता है | कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और नोबेल पुरस्कृत के साथ वे काम कर रहें हैं | इसके अलावा उन्होंने कई दलित, नारीवादी और आदिवासी लेखकों को भी प्रकाशित किया है |

अदिति कहती हैं की छपी हुई किताबें कभी भी ख़त्म नहीं होंगी | पिछले कुछ वर्षों में कई नई शैलियों, पाठकों और कहानियों का विकास हुआ है | वाणी एक साल में 225 से अधिक नई किताबें प्रकाशित करती है | “ऐसा लगता है की हम हर दिन एक नई किताब को अपनी टेबल पर देखते हैं |”

उन्हें अपने मार्किट शेयर के बारे में पता नहीं है क्यूंकि इसके लिए भारत में प्रकाशन के डेटा की कमी है | बेस्ट-सेलर होने के लिए किताब की, 2 साल के अन्दर, 5000-7000 कापियां बिकनी चाहिए | पर वाणी को अपनी हर किताब पसंद है और वे सब किताबों को बराबर मानते हैं |
बिक्री के हिसाब से किताबों, साहित्य और भाषा का मूल्यांकन नहीं होना चाहिए |

अदिति के इस बात से हम पूरी तरह सहमत हैं | वाणी इसी तरह बेहतरीन हिंदी पुस्तकें निकालते रहे | क्या आपने कोई वाणी प्रकाशन की किताबें पढ़ी हैं ?

टीनेजेर्स के लिए नई भारतीय किताबें

साहित्य और कला के बहुत सारे मकसद होते हैं. मैं मानता हूँ की ये सफल तभी होते हैं जब ये सामाजिक विचारों को थोड़ा आगे ले जाते हैं. सिर्फ मुनाफा अगर सफलता का पैमाना बन जाता है तो हमारी कला और साहित्य कभी भी असुविधाजनक या प्रगतिशील विषयों को समाज के सामने नहीं लाएगी. भारतीय बाल साहित्य में भी यही मुद्दा है. अच्छी बात ये है की कई वर्षों से तारा, तुलिका, जुबान जैसे प्रकाशन कई प्रगतिशील और नई पुस्तकें लाएं हैं.

Mostly Madly Mayil

निवेदिता सुब्रमण्यम और सौम्या राजेंद्रन की लिखी हुई ‘मोस्टली मैडली मायिल’ एक ऐसी ही किताब है. मायिल चेन्नई में रहने वाली टीनेजर लड़की है जो डायरी द्वारा अपनी ज़िन्दगी में एक झलक प्रदान करती है. मायिल जैसी एक बड़ी होती लड़की के मसलों पर एक सच्चा, सरल, स्पष्ट और निजी नज़रिया मिलता है. जिन चीज़ों के बारे में हमारा समाज खुल कर बात नहीं करता – मासिक धर्म (माहवारी या पीरियड) का आना हो, ब्रा खरीदना हो, स्कूल में लड़कों के प्रति आकर्षण हो, या माता-पिता के झगडे हों, उनको इतनी सामान्यता से लिखा गया है की उनमे कोई अभिन्नता लगती ही नहीं है. मायिल के साथ एक बार एक आदमी के सेक्शुअल दुराचार को भी एक वास्तविकता के साथ बताया गया है. अगर माँ-बाप किताब पढ़ने के बाद भी अपने बच्चों को यह किताब दे रहें हैं तो मैं ख़ुशी से आशचर्यचकित हूँ. हम बच्चों से सच्चाई न छिपाएँ, उन्हें उपदेश न दें, अपनी खामियों को भी स्वीकार करें – इसी तरह की किताबें, हमारे समाज की सोच में बदलाव ला सकती हैं.
किताब अंग्रेजी में है और ज़्यादातर एक बहुत ही प्रगतिशील, शेहरी परिवार के बच्चे इस किताब को पढ़ेंगे. इस तरह की किताबें भारतीय भाषाओँ में कब लिखी जाएँगी? क्या बड़े होते बच्चों के मुद्दों को – आकर्षण, सेक्स, मृत्य, शारीरिक बदलाव, लड़का-लड़की में भेदभाव, आज़ादी – भारतीय भाषाओँ में सरलता और वास्तविकता से पेश किया जा सकता है?

सबसे बड़ा सवाल है की ऐसे मुश्किल मुद्दों पर किताबों को प्रकाशित कौन करेगा? क्यूंकि एक सामाजिक विभाजन भी है उन परिवारों में जो अंग्रेजी पढ़ने और न पढ़ने वालों में, तो ऐसी किताबों को भारतीय भाषाओं में प्रकाशित करना और भी मुश्किल हो जाता है. अंग्रेजी पढ़ने वाले परिवार के बच्चों के पास फॉरेन और अच्छे भारतीय प्रकाशकों का विकल्प है. भारतीय भाषाओँ में युवा बच्चों के लिए साहित्य न के बराबर है. ज़्यादातर प्रचलन उपदेशपूर्ण या जासूसी कहानियों का है. पर सभी लोगों को ‘मोस्टली मैडली मायिल’ की तरह की किताबों की ज़रुरत है. क्या प्रकाशक ऐसे असुविधाजनक किताबों को प्रकाशित करने का साहस और इच्छा रखते हैं? और माँ-बाप खरीदने की?

ऐसे विषयों को अलग अलग प्रसंग की भी ज़रुरत है – शहर में, गाँव में, स्लम में. शायद गाँव में एक लड़के की डायरी पढ़ना भी इतना ही रोमांचक हो?

तुलिका बुक्स की राधिका मेनन से बातचीत

हाल ही में असिम्प्टोट के ब्लॉग पर तुलिका बुक्स की स्थापक और मैनेजिंग संपादक, राधिका मेनन का इंटरव्यू प्रकाशित हुआ. सोहिनी बसक ने उनका इंटरव्यू लिया. इस इंटरव्यू  का हिंदी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत हैं.

सोहिनी – तुलिका की शुरुआत कैसे हुई?
राधिका – 1996 में जब हमने तुलिका पब्लिशर्स की शुरुआत करी, हम ऐसी भारतीय किताबें बनाना चाहते थे जो दुनिया की सबसे बेहतरीन किताबों के बराबर हों. बच्चों को सर्वश्रेष्ठ स्तर की किताबें मिलें जो भारतीय सन्दर्भ की हों. मेरी पीड़ी पाश्चात्य किताबों को पढ़ के तंग आ चुकी थी और हमें भारतीय, उपदेशपूर्ण, सार्वजानिक किताबों से दूर रहना सिखाया गया था. हमें लगता था की अच्छी किताबें तो विदेश, अमूमन इंग्लैंड, से ही आती हैं.
हमें नई भारतीय समझ और सोच को दर्शाना था पर नई भारतीय सोच (हमेशा की तरह) विशाल, विविध और बहुभाषी है. हमारे लिए स्पष्ट था की हमें ज़्यादा से ज़्यादा भारतीय भाषाओँ में किताबें प्रकाशित करनी हैं.

आज हम एक साथ 9 भाषाओँ में किताबें प्रकाशित करते हैं – अंग्रेजी, हिंदी, तमिल, मलयालम, कन्नड़, तेलुगू, मराठी, गुजराती और बंगाली. हम द्विभाषी (बाईलिंगुअल) किताबें भी बनाते हैं – अंग्रेजी और अन्य 8 भाषाओँ में से एक. बड़े बच्चों की कुछ किताबें सिर्फ अंग्रेजी में उपलब्ध हैं और वो भी अपने दृष्टिकोण और रचना में नई भारतीय सोच को दर्शाते हैं.

सोहिनी – अपनी हाल ही की सफलताओं के बारे में बताइए.
राधिका

My Gandhi Story

मेरी गाँधी कथा

9 भाषाओँ में प्रकाशित, ‘मेरी गाँधी कथा’ 5 साल और उससे से ज़्यादा उम्र के बच्चों के लिए एक पिक्चर बुक है. एक वार्ली कलाकार, एक एनीमेशन फिल्म निर्माता और एक कथाकार के बीच एक असामान्य सहयोग का परिणाम एक ऐसी किताब है जो पढ़ने के अलावा दिखने में भी बेहतरीन है. एक और फायदा है की इसकी सेल भी बहुत अच्छी है.

जादुई मच्छी (6+ उम्र, 9 भाषाएँ), मध्य भारत गोंड जनजाति के एक कथाकार और एक कलाकार का मिलन है. कथाकार, चन्द्रकला जगत, एक दैनिक मज़दूर जिनको मकानों के निर्माण और तालाब की खुदाई की आदत है, ने अपनी ताकत और दृढ़ता को कहानी में बूढ़ी औरत के चरित्र में डाल दिया है. हाल ही में एक समीक्षा में इसकी तारीफ में कहा गया – “इस कहानी में शब्दों और कला को जिस आसानी और सादगी के साथ एक साथ बुना गया है, उसमें कुछ अलग ही सुन्दरता है.”

जादुई मछली

नदियों की दौड़

हाल ही में दो पुस्तकें, हम्ब्रील्माई का करघा (अरुणाचल प्रदेश की लोक कथा) और नदियों की दौड़ (मेघालय की लोक कथा), पहली बार आदिवासी पूर्वोत्तर भारत की मिश्मी और खासी भाषाओँ में पिक्चर बुक्स हैं. जैसा की हम सामान्य रूप से करते हैं, उन्हें भी नौ भाषाओँ में प्रकाशित किया गया है.

हालाँकि ये हाल ही की नहीं है, पर मैं हमारी बहुभाषी किताब “ओलुगुटी तोलुगुटी: भारतीय रायीम्स पढ़ने और गुनगुनाने के लिए ” को शामिल करना चाहूंगी. ये 18 भारतीय भाषाओँ में 54 रायीम्स का संग्रह है (कोंकणी, लोथा, मेवाड़ी और मिज़ो जैसी कम प्रचलित भाषाओँ को मिला कर) जो अंग्रेजी नर्सरी रायीम्स पर कई सालों से बड़े हुए भारतीय बच्चों के लिए एक सांस्कृतिक विकल्प है. इन रायीम्स को मूल भाषा, रोमन लिपि और देवनागरी लिपि में प्रस्तुत करने के साथ साथ वास्तविक लय को ध्यान में रखते हुए अंग्रेजी में भी रूपांतरित किया गया है ताकि ये ज्यादा लोगों तक आसानी से पहुँच सके.

ओलुगुती तोलुगुती

सोहिनी – तुलिका पिक्चर बुक्स में माहिर है और बच्चों के लिए द्विभाषी किताबों की सोच बहुत ही दिलचस्प है. द्विभाषी किताबें बनाते समय क्या चित्रण का माध्यम एक भाषा से दूसरी भाषा के अनुवाद में मदद करता है?
राधिका – चित्र अन्य पिक्चर बुक्स की तरह इन किताबों को भी रोमांचक बनाते हैं – भले ही माता-पिता और शिक्षक उन्हें “भाषा सीखने” के कारण लेते हों, वह इतना महत्वपूर्ण नहीं होता. चित्र नयी भाषाओँ में शब्दों को समझने में मदद करते हैं. द्विभाषी किताबों में चित्रण लोक और समकालीन शैली से लेकर तस्वीरों और ग्राफ़िक्स तक होता है. ये द्विभाषी किताबों में एक नया आयाम जोड़ते हैं और एक नयी भाषा कम जटिल लगती है.

सोहिनी – भारत में अभी तक अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाले बच्चों और दूसरी भारतीय भाषाओँ में पढ़ने वाले बच्चों के बीच में एक विभाजन है. एक शिक्षक और प्रकाशक के रूप में, क्या आप इस विभाजन से बच्चों की पढ़ने की आदतों में, यहाँ तक की उनके माता-पिताओं की भी, फर्क देखते हैं? खासकर भाषाओँ के ऊपर किताबें चुनने में.
राधिका – अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाले और दूसरी भारतीय भाषाओँ में पढ़ने वाले बच्चों के बीच में एक विभाजन तो है. जबकि ये विभाजन दो प्रकार के स्कूलों के बच्चों की आर्थिक और सामाजिक असमानता के कारण हुआ है, ये विभाजन गहरा शिक्षा के माध्यम से हुआ है. विडम्बना ये है की भाषा का उद्देश्य एक दुसरे के साथ जुड़ने के लिए है, न की बांटने के लिए. अंग्रेजी उच्च लोगों की भाषा बन गई है और इसे सत्ता और पैसे के साथ जोड़ा जाता है. उच्च अंग्रेजी स्कूल जो अच्छी फीस लेते हैं, उनके पास बेहतर आर्थिक संसाधन होते हैं, और मुकाबले में बेहतर सुविधाएँ जिसमे एक लाइब्रेरी भी शामिल है. ये हर स्कूल के लिए सच नहीं है और कई अच्छे प्राइवेट स्कूलों में लाइब्रेरी में किताबों का अच्छा संग्रह नहीं होता है. और अक्सर किताबों का चयन और लाइब्रेरी के नियम बच्चों की किताबों में रूचि बढ़ाने के लिए कुछ नहीं करते हैं.

सिर्फ अंग्रेजी माध्यमिक स्कूल या गैर-अंग्रेजी माध्यमिक स्कूल होने से, या अमीर या गरीब स्कूल का मतलब यह नहीं है की स्कूल में लाइब्रेरी अच्छी है या पढ़ने को प्रोत्साहित करती है. दूसरी ओर, ऐसे सरकारी स्कूल जहाँ प्रेरित शिक्षक हैं और स्कूल जहाँ गैर-सरकारी संगठन (NGOs) लाइब्रेरी कार्यक्रमों को चलाते हैं, बच्चों के पढ़ने की क्षमता में काफी फर्क होने के बावजूद, वो सफलतापूर्वक बच्चों में किताबों के लिए प्यार और पढ़ने की रूचि को बढ़ावा देते हैं. पढ़ने की अरूचि का सम्बन्ध माता-पिता और शिक्षकों के नज़रिए से ज़्यादा है बजाय शिक्षा के माध्यम से.

और बेशक अच्छी किताबों से सब फर्क पड़ता है. अंग्रेजी भाषा की किताबों और अन्य भारतीय भाषाओँ की किताबों के स्तर में अंतर है : लेखन, चित्रण और उत्पादन में. इसका यह मतलब नहीं है की इन भाषाओँ में अच्छी किताबें हैं ही नहीं. लेकिन इन्हें सस्ते में उपलब्ध करने के दबाव के कारण प्रकाशक आम उत्पादित किताबें पसंद करते हैं. यहाँ तुलिका जैसे प्रकाशकों ने फर्क दिखाया है.

हम चाहते हैं तुलिका की किताबें सब जगह जाएँ – और वो जाती हैं. तुलिका की किताबें गाँव के पुस्तकालयों, बड़े शहरी स्कूलों, सरकारी स्कूलों और दुनिया भर के पुस्तकालयों में पाई जाती हैं. जो किताबें अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी हैं, वो किताबें भारत के दूर कोनों में बच्चों द्वारा पढ़ी जा रही हैं. सभी भाषाओँ की पुस्तकों की कहानी, डिजाईन और उत्पादन पर बराबर ध्यान दिया जाता है ताकि भारत में पहली बार बच्चों को, बिना किसी भेद-भाव के, उच्च किताबें उन भाषाओँ में मिलें जो वो समझ सकें.

सोहिनी – बहुभाषी प्रकाशन का तुलिका के ऊपर क्या प्रभाव रहा है?
राधिका – हमारी किताबों में एक अलग फ्लेवर, एक अलग संवेदनशीलता है, जो अन्य किताबों से अलग है. मेरे ख्याल से यह कई भाषाओँ में अनुवाद करने का परिणाम है. क्षेत्रीय भाषाओँ में बाल-प्रकाशन अक्सर बच्चों की किताबों के विषय और उपयोग के बारे में सीमित सांस्कृतिक मान्यताओं और विचारों में बन्ध जाता है. रूढ़िवादी नज़रिए उसको और सिमित कर देते हैं. ज़यादातर, किताबें शिक्षाप्रद और पारंपरिक रहती हैं.

इसके विपरीत, अंग्रेजी में अच्छी भारतीय किताबें – हालाँकि यहाँ भी काफी औसत किताबें हैं – में एक गतिशील सांस्कृतिक पहचान है जो लगातार बदल रही और विकसित हो रही है. इन लेखकों की शैली और नज़रिया एक सांस्कृतिक रूप से अलग ही ‘अनुवादित’ समझ से आता है. उन्हें पाश्चात्य और संस्कृतिहीन कहना एक बढ़ती संख्या के बच्चों को अस्वीकार करना है जो अंग्रेजी में सोचते और बोलते हैं पर क्षेत्रीय भाषा के वातावरण में रहते हैं. वह उनके परिवारों में, उनके पड़ोस में और उनके फिल्मों, गानों और टीवी कार्यक्रमों में है. अंग्रेजी को अनदेखा करने का मतलब उन बड़ी संख्या में बच्चों की ज़रूरतों को अनदेखा करना है जो अंग्रेजी को सक्षमता के कारण सीखने के इच्छुक हैं.

संपादक के रूप में, हमें कभी-कभी कमी महसूस होती हैं क्यूंकि हम मुख्य रूप से अंग्रेजी बोलने वाले रहें हैं. दूसरी ओर, बच्चों के लिए कहानियों को अंग्रेजी में पहले और फिर अलग भाषाओँ में समझने से हमारी सोच खुलती है और हम अन्य भाषाओँ के रंग और दृष्टिकोण को सीखते हैं. लेखक और अनुवादक केवल एक ही भाषा में किताब को देखते हैं, पर सम्पादकीय निर्णय पर सभी 9 भाषाओँ का प्रभाव पड़ता है – किताब के शीर्षक से शुरू होते हुए.

यह एक बाल-साहित्य के लिए जगह बनाता है जो क्षेत्रों, भाषाओँ और संस्कृतियों की संयुक्तता और विशेषताएं दर्शाता है. हमारा विश्वास है की यह किताबें एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति के बीच मार्ग दर्शाती हैं. इन किताबों की कोई सीमा नहीं है.