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तुलिका बुक्स की राधिका मेनन से बातचीत

हाल ही में असिम्प्टोट के ब्लॉग पर तुलिका बुक्स की स्थापक और मैनेजिंग संपादक, राधिका मेनन का इंटरव्यू प्रकाशित हुआ. सोहिनी बसक ने उनका इंटरव्यू लिया. इस इंटरव्यू  का हिंदी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत हैं.

सोहिनी – तुलिका की शुरुआत कैसे हुई?
राधिका – 1996 में जब हमने तुलिका पब्लिशर्स की शुरुआत करी, हम ऐसी भारतीय किताबें बनाना चाहते थे जो दुनिया की सबसे बेहतरीन किताबों के बराबर हों. बच्चों को सर्वश्रेष्ठ स्तर की किताबें मिलें जो भारतीय सन्दर्भ की हों. मेरी पीड़ी पाश्चात्य किताबों को पढ़ के तंग आ चुकी थी और हमें भारतीय, उपदेशपूर्ण, सार्वजानिक किताबों से दूर रहना सिखाया गया था. हमें लगता था की अच्छी किताबें तो विदेश, अमूमन इंग्लैंड, से ही आती हैं.
हमें नई भारतीय समझ और सोच को दर्शाना था पर नई भारतीय सोच (हमेशा की तरह) विशाल, विविध और बहुभाषी है. हमारे लिए स्पष्ट था की हमें ज़्यादा से ज़्यादा भारतीय भाषाओँ में किताबें प्रकाशित करनी हैं.

आज हम एक साथ 9 भाषाओँ में किताबें प्रकाशित करते हैं – अंग्रेजी, हिंदी, तमिल, मलयालम, कन्नड़, तेलुगू, मराठी, गुजराती और बंगाली. हम द्विभाषी (बाईलिंगुअल) किताबें भी बनाते हैं – अंग्रेजी और अन्य 8 भाषाओँ में से एक. बड़े बच्चों की कुछ किताबें सिर्फ अंग्रेजी में उपलब्ध हैं और वो भी अपने दृष्टिकोण और रचना में नई भारतीय सोच को दर्शाते हैं.

सोहिनी – अपनी हाल ही की सफलताओं के बारे में बताइए.
राधिका

My Gandhi Story

मेरी गाँधी कथा

9 भाषाओँ में प्रकाशित, ‘मेरी गाँधी कथा’ 5 साल और उससे से ज़्यादा उम्र के बच्चों के लिए एक पिक्चर बुक है. एक वार्ली कलाकार, एक एनीमेशन फिल्म निर्माता और एक कथाकार के बीच एक असामान्य सहयोग का परिणाम एक ऐसी किताब है जो पढ़ने के अलावा दिखने में भी बेहतरीन है. एक और फायदा है की इसकी सेल भी बहुत अच्छी है.

जादुई मच्छी (6+ उम्र, 9 भाषाएँ), मध्य भारत गोंड जनजाति के एक कथाकार और एक कलाकार का मिलन है. कथाकार, चन्द्रकला जगत, एक दैनिक मज़दूर जिनको मकानों के निर्माण और तालाब की खुदाई की आदत है, ने अपनी ताकत और दृढ़ता को कहानी में बूढ़ी औरत के चरित्र में डाल दिया है. हाल ही में एक समीक्षा में इसकी तारीफ में कहा गया – “इस कहानी में शब्दों और कला को जिस आसानी और सादगी के साथ एक साथ बुना गया है, उसमें कुछ अलग ही सुन्दरता है.”

जादुई मछली

नदियों की दौड़

हाल ही में दो पुस्तकें, हम्ब्रील्माई का करघा (अरुणाचल प्रदेश की लोक कथा) और नदियों की दौड़ (मेघालय की लोक कथा), पहली बार आदिवासी पूर्वोत्तर भारत की मिश्मी और खासी भाषाओँ में पिक्चर बुक्स हैं. जैसा की हम सामान्य रूप से करते हैं, उन्हें भी नौ भाषाओँ में प्रकाशित किया गया है.

हालाँकि ये हाल ही की नहीं है, पर मैं हमारी बहुभाषी किताब “ओलुगुटी तोलुगुटी: भारतीय रायीम्स पढ़ने और गुनगुनाने के लिए ” को शामिल करना चाहूंगी. ये 18 भारतीय भाषाओँ में 54 रायीम्स का संग्रह है (कोंकणी, लोथा, मेवाड़ी और मिज़ो जैसी कम प्रचलित भाषाओँ को मिला कर) जो अंग्रेजी नर्सरी रायीम्स पर कई सालों से बड़े हुए भारतीय बच्चों के लिए एक सांस्कृतिक विकल्प है. इन रायीम्स को मूल भाषा, रोमन लिपि और देवनागरी लिपि में प्रस्तुत करने के साथ साथ वास्तविक लय को ध्यान में रखते हुए अंग्रेजी में भी रूपांतरित किया गया है ताकि ये ज्यादा लोगों तक आसानी से पहुँच सके.

ओलुगुती तोलुगुती

सोहिनी – तुलिका पिक्चर बुक्स में माहिर है और बच्चों के लिए द्विभाषी किताबों की सोच बहुत ही दिलचस्प है. द्विभाषी किताबें बनाते समय क्या चित्रण का माध्यम एक भाषा से दूसरी भाषा के अनुवाद में मदद करता है?
राधिका – चित्र अन्य पिक्चर बुक्स की तरह इन किताबों को भी रोमांचक बनाते हैं – भले ही माता-पिता और शिक्षक उन्हें “भाषा सीखने” के कारण लेते हों, वह इतना महत्वपूर्ण नहीं होता. चित्र नयी भाषाओँ में शब्दों को समझने में मदद करते हैं. द्विभाषी किताबों में चित्रण लोक और समकालीन शैली से लेकर तस्वीरों और ग्राफ़िक्स तक होता है. ये द्विभाषी किताबों में एक नया आयाम जोड़ते हैं और एक नयी भाषा कम जटिल लगती है.

सोहिनी – भारत में अभी तक अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाले बच्चों और दूसरी भारतीय भाषाओँ में पढ़ने वाले बच्चों के बीच में एक विभाजन है. एक शिक्षक और प्रकाशक के रूप में, क्या आप इस विभाजन से बच्चों की पढ़ने की आदतों में, यहाँ तक की उनके माता-पिताओं की भी, फर्क देखते हैं? खासकर भाषाओँ के ऊपर किताबें चुनने में.
राधिका – अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाले और दूसरी भारतीय भाषाओँ में पढ़ने वाले बच्चों के बीच में एक विभाजन तो है. जबकि ये विभाजन दो प्रकार के स्कूलों के बच्चों की आर्थिक और सामाजिक असमानता के कारण हुआ है, ये विभाजन गहरा शिक्षा के माध्यम से हुआ है. विडम्बना ये है की भाषा का उद्देश्य एक दुसरे के साथ जुड़ने के लिए है, न की बांटने के लिए. अंग्रेजी उच्च लोगों की भाषा बन गई है और इसे सत्ता और पैसे के साथ जोड़ा जाता है. उच्च अंग्रेजी स्कूल जो अच्छी फीस लेते हैं, उनके पास बेहतर आर्थिक संसाधन होते हैं, और मुकाबले में बेहतर सुविधाएँ जिसमे एक लाइब्रेरी भी शामिल है. ये हर स्कूल के लिए सच नहीं है और कई अच्छे प्राइवेट स्कूलों में लाइब्रेरी में किताबों का अच्छा संग्रह नहीं होता है. और अक्सर किताबों का चयन और लाइब्रेरी के नियम बच्चों की किताबों में रूचि बढ़ाने के लिए कुछ नहीं करते हैं.

सिर्फ अंग्रेजी माध्यमिक स्कूल या गैर-अंग्रेजी माध्यमिक स्कूल होने से, या अमीर या गरीब स्कूल का मतलब यह नहीं है की स्कूल में लाइब्रेरी अच्छी है या पढ़ने को प्रोत्साहित करती है. दूसरी ओर, ऐसे सरकारी स्कूल जहाँ प्रेरित शिक्षक हैं और स्कूल जहाँ गैर-सरकारी संगठन (NGOs) लाइब्रेरी कार्यक्रमों को चलाते हैं, बच्चों के पढ़ने की क्षमता में काफी फर्क होने के बावजूद, वो सफलतापूर्वक बच्चों में किताबों के लिए प्यार और पढ़ने की रूचि को बढ़ावा देते हैं. पढ़ने की अरूचि का सम्बन्ध माता-पिता और शिक्षकों के नज़रिए से ज़्यादा है बजाय शिक्षा के माध्यम से.

और बेशक अच्छी किताबों से सब फर्क पड़ता है. अंग्रेजी भाषा की किताबों और अन्य भारतीय भाषाओँ की किताबों के स्तर में अंतर है : लेखन, चित्रण और उत्पादन में. इसका यह मतलब नहीं है की इन भाषाओँ में अच्छी किताबें हैं ही नहीं. लेकिन इन्हें सस्ते में उपलब्ध करने के दबाव के कारण प्रकाशक आम उत्पादित किताबें पसंद करते हैं. यहाँ तुलिका जैसे प्रकाशकों ने फर्क दिखाया है.

हम चाहते हैं तुलिका की किताबें सब जगह जाएँ – और वो जाती हैं. तुलिका की किताबें गाँव के पुस्तकालयों, बड़े शहरी स्कूलों, सरकारी स्कूलों और दुनिया भर के पुस्तकालयों में पाई जाती हैं. जो किताबें अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी हैं, वो किताबें भारत के दूर कोनों में बच्चों द्वारा पढ़ी जा रही हैं. सभी भाषाओँ की पुस्तकों की कहानी, डिजाईन और उत्पादन पर बराबर ध्यान दिया जाता है ताकि भारत में पहली बार बच्चों को, बिना किसी भेद-भाव के, उच्च किताबें उन भाषाओँ में मिलें जो वो समझ सकें.

सोहिनी – बहुभाषी प्रकाशन का तुलिका के ऊपर क्या प्रभाव रहा है?
राधिका – हमारी किताबों में एक अलग फ्लेवर, एक अलग संवेदनशीलता है, जो अन्य किताबों से अलग है. मेरे ख्याल से यह कई भाषाओँ में अनुवाद करने का परिणाम है. क्षेत्रीय भाषाओँ में बाल-प्रकाशन अक्सर बच्चों की किताबों के विषय और उपयोग के बारे में सीमित सांस्कृतिक मान्यताओं और विचारों में बन्ध जाता है. रूढ़िवादी नज़रिए उसको और सिमित कर देते हैं. ज़यादातर, किताबें शिक्षाप्रद और पारंपरिक रहती हैं.

इसके विपरीत, अंग्रेजी में अच्छी भारतीय किताबें – हालाँकि यहाँ भी काफी औसत किताबें हैं – में एक गतिशील सांस्कृतिक पहचान है जो लगातार बदल रही और विकसित हो रही है. इन लेखकों की शैली और नज़रिया एक सांस्कृतिक रूप से अलग ही ‘अनुवादित’ समझ से आता है. उन्हें पाश्चात्य और संस्कृतिहीन कहना एक बढ़ती संख्या के बच्चों को अस्वीकार करना है जो अंग्रेजी में सोचते और बोलते हैं पर क्षेत्रीय भाषा के वातावरण में रहते हैं. वह उनके परिवारों में, उनके पड़ोस में और उनके फिल्मों, गानों और टीवी कार्यक्रमों में है. अंग्रेजी को अनदेखा करने का मतलब उन बड़ी संख्या में बच्चों की ज़रूरतों को अनदेखा करना है जो अंग्रेजी को सक्षमता के कारण सीखने के इच्छुक हैं.

संपादक के रूप में, हमें कभी-कभी कमी महसूस होती हैं क्यूंकि हम मुख्य रूप से अंग्रेजी बोलने वाले रहें हैं. दूसरी ओर, बच्चों के लिए कहानियों को अंग्रेजी में पहले और फिर अलग भाषाओँ में समझने से हमारी सोच खुलती है और हम अन्य भाषाओँ के रंग और दृष्टिकोण को सीखते हैं. लेखक और अनुवादक केवल एक ही भाषा में किताब को देखते हैं, पर सम्पादकीय निर्णय पर सभी 9 भाषाओँ का प्रभाव पड़ता है – किताब के शीर्षक से शुरू होते हुए.

यह एक बाल-साहित्य के लिए जगह बनाता है जो क्षेत्रों, भाषाओँ और संस्कृतियों की संयुक्तता और विशेषताएं दर्शाता है. हमारा विश्वास है की यह किताबें एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति के बीच मार्ग दर्शाती हैं. इन किताबों की कोई सीमा नहीं है.

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