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टीनेजेर्स के लिए नई भारतीय किताबें

साहित्य और कला के बहुत सारे मकसद होते हैं. मैं मानता हूँ की ये सफल तभी होते हैं जब ये सामाजिक विचारों को थोड़ा आगे ले जाते हैं. सिर्फ मुनाफा अगर सफलता का पैमाना बन जाता है तो हमारी कला और साहित्य कभी भी असुविधाजनक या प्रगतिशील विषयों को समाज के सामने नहीं लाएगी. भारतीय बाल साहित्य में भी यही मुद्दा है. अच्छी बात ये है की कई वर्षों से तारा, तुलिका, जुबान जैसे प्रकाशन कई प्रगतिशील और नई पुस्तकें लाएं हैं.

Mostly Madly Mayil

निवेदिता सुब्रमण्यम और सौम्या राजेंद्रन की लिखी हुई ‘मोस्टली मैडली मायिल’ एक ऐसी ही किताब है. मायिल चेन्नई में रहने वाली टीनेजर लड़की है जो डायरी द्वारा अपनी ज़िन्दगी में एक झलक प्रदान करती है. मायिल जैसी एक बड़ी होती लड़की के मसलों पर एक सच्चा, सरल, स्पष्ट और निजी नज़रिया मिलता है. जिन चीज़ों के बारे में हमारा समाज खुल कर बात नहीं करता – मासिक धर्म (माहवारी या पीरियड) का आना हो, ब्रा खरीदना हो, स्कूल में लड़कों के प्रति आकर्षण हो, या माता-पिता के झगडे हों, उनको इतनी सामान्यता से लिखा गया है की उनमे कोई अभिन्नता लगती ही नहीं है. मायिल के साथ एक बार एक आदमी के सेक्शुअल दुराचार को भी एक वास्तविकता के साथ बताया गया है. अगर माँ-बाप किताब पढ़ने के बाद भी अपने बच्चों को यह किताब दे रहें हैं तो मैं ख़ुशी से आशचर्यचकित हूँ. हम बच्चों से सच्चाई न छिपाएँ, उन्हें उपदेश न दें, अपनी खामियों को भी स्वीकार करें – इसी तरह की किताबें, हमारे समाज की सोच में बदलाव ला सकती हैं.
किताब अंग्रेजी में है और ज़्यादातर एक बहुत ही प्रगतिशील, शेहरी परिवार के बच्चे इस किताब को पढ़ेंगे. इस तरह की किताबें भारतीय भाषाओँ में कब लिखी जाएँगी? क्या बड़े होते बच्चों के मुद्दों को – आकर्षण, सेक्स, मृत्य, शारीरिक बदलाव, लड़का-लड़की में भेदभाव, आज़ादी – भारतीय भाषाओँ में सरलता और वास्तविकता से पेश किया जा सकता है?

सबसे बड़ा सवाल है की ऐसे मुश्किल मुद्दों पर किताबों को प्रकाशित कौन करेगा? क्यूंकि एक सामाजिक विभाजन भी है उन परिवारों में जो अंग्रेजी पढ़ने और न पढ़ने वालों में, तो ऐसी किताबों को भारतीय भाषाओं में प्रकाशित करना और भी मुश्किल हो जाता है. अंग्रेजी पढ़ने वाले परिवार के बच्चों के पास फॉरेन और अच्छे भारतीय प्रकाशकों का विकल्प है. भारतीय भाषाओँ में युवा बच्चों के लिए साहित्य न के बराबर है. ज़्यादातर प्रचलन उपदेशपूर्ण या जासूसी कहानियों का है. पर सभी लोगों को ‘मोस्टली मैडली मायिल’ की तरह की किताबों की ज़रुरत है. क्या प्रकाशक ऐसे असुविधाजनक किताबों को प्रकाशित करने का साहस और इच्छा रखते हैं? और माँ-बाप खरीदने की?

ऐसे विषयों को अलग अलग प्रसंग की भी ज़रुरत है – शहर में, गाँव में, स्लम में. शायद गाँव में एक लड़के की डायरी पढ़ना भी इतना ही रोमांचक हो?

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